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लॉरेंस कोहलबर्ग
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कोहलबर्ग के अनुसार, 'उत्तर-परंपरागत स्तर' (Post-Conventional Level) में नैतिकता का आधार क्या है?

विस्तृत व्याख्या एवं समाधान

📌 मुख्य संकल्पना / सिद्धांत:

लॉरेंस कोहलबर्ग के नैतिक विकास के सिद्धांत में 'उत्तर-परंपरागत स्तर' (Post-Conventional Level) इस सिद्धांत का सर्वोच्च और अंतिम चरण है, जो लगभग 13 वर्ष की आयु से शुरू होकर वयस्कता तक चलता है। इस स्तर पर नैतिकता बाहरी सामाजिक दबावों या नियमों से मुक्त हो जाती है और व्यक्ति के अपने आंतरिक नैतिक सिद्धांतों (Internal moral principles), अंतरात्मा (Conscience), और सार्वभौमिक मानवाधिकारों पर आधारित होती है। यहाँ व्यक्ति यह समझता है कि कानून और नियम लचीले हो सकते हैं यदि वे मानवीय न्याय और कल्याण के सिद्धांतों के खिलाफ जाते हैं। इसलिए, इस स्तर पर सही और गलत का निर्णय समाज की स्वीकृत परंपराओं के आधार पर नहीं, बल्कि स्व-निर्मित नैतिक मूल्यों के आधार पर किया जाता है। अतः विकल्प 'b' इस प्रश्न का सही उत्तर है।

📊 परीक्षा उपयोगी मुख्य बिंदु:

  • कोहलबर्ग के नैतिक विकास के सिद्धांत में कुल तीन स्तर (Levels) और प्रत्येक स्तर में दो अवस्थाएँ यानी कुल छह चरण (Stages) हैं।
  • पूर्व-परंपरागत स्तर (Pre-Conventional) में नैतिकता का आधार दंड का भय और पुरस्कार की लालसा (विकल्प c और d) होता है।
  • परंपरागत स्तर (Conventional) में नैतिकता का आधार सामाजिक नियम, कानून और दूसरों की स्वीकृति (विकल्प a) होता है।
  • उत्तर-परंपरागत स्तर (Post-Conventional) में व्यक्ति अपने व्यक्तिगत और सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांतों (विकल्प b) का पालन करता है।

📖 सैद्धांतिक संदर्भ: लॉरेंस कोहलबर्ग ने जीन पियाजे के संज्ञानात्मक विकास के विचारों को आगे बढ़ाते हुए नैतिक विकास का एक व्यापक संज्ञानात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उन्होंने हाइन्ज दुविधा (Heinz Dilemma) का उपयोग करके बच्चों और वयस्कों के नैतिक तार्किकता का अध्ययन किया। अधिक जानने के लिए पढ़ें कोहलबर्ग का सिद्धांत।

🎯 परीक्षा दृष्टिकोण: CTET / UPTET / BPSC TRE हेतु महत्वपूर्ण विस्तृत हल ➔

गहन विश्लेषण एवं परीक्षा उपयोगी रणनीतियाँ:

शिक्षक पात्रता परीक्षाओं (जैसे CTET, UPTET, KVS, REET) में कोहलबर्ग के चरणों से संबंधित प्रश्न अक्सर व्यावहारिक परिस्थितियों या 'हाइन्ज दुविधा' के संदर्भ में पूछे जाते हैं। परीक्षार्थियों को यह ध्यान रखना चाहिए कि सामाजिक नियम (Social rules) पारंपरिक स्तर की विशेषता हैं, जबकि आंतरिक विवेक और सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत उत्तर-परंपरागत स्तर को दर्शाते हैं। अध्यापन के दौरान शिक्षकों को बालकों में ऐसी नैतिक समझ विकसित करनी चाहिए जो केवल दंड या पुरस्कार पर आधारित न होकर तार्किक चिंतन और मानवाधिकारों के सम्मान पर टिकी हो।

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