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उत्तर-पारंपरिक नैतिकता (Post-conventional Morality) क्या है?

उत्तर-पारंपरिक नैतिकता कोहलबर्ग का सबसे ऊँचा स्तर है, जिसमें व्यक्ति नियमों को समाज के अनुबंध मानता है और ज़रूरत पड़ने पर अपने सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांतों के आधार पर उनसे ऊपर उठकर फ़ैसला करता है। बहुत कम लोग इस स्तर तक पहुँचते हैं।

उत्तर-पारंपरिक नैतिकता: विस्तृत व्याख्या

उत्तर-पारंपरिक नैतिकता को समझें

पाँचवें चरण में व्यक्ति कानून को लोगों के हित के लिए बना समझौता मानता है, जिसे बदला भी जा सकता है। छठे चरण में न्याय, समानता और मानव गरिमा जैसे सार्वभौमिक सिद्धांत उसके लिए सबसे ऊपर होते हैं, भले ही वे किसी कानून से टकराएँ।

याद रखने योग्य बिंदु

  • चरण 5: सामाजिक अनुबंध और व्यक्तिगत अधिकार
  • चरण 6: सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत
  • अनुचित कानून का विरोध इसी स्तर की पहचान है

उदाहरण

कोई नागरिक अन्यायपूर्ण कानून का शांतिपूर्ण विरोध करता है, क्योंकि उसके लिए सबकी समानता का सिद्धांत किसी भी लिखित नियम से ऊपर है।

परीक्षा में कैसे पूछा जाता है

सामाजिक अनुबंध और सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत ये दो पद पढ़ते ही उत्तर-पारंपरिक चुनें। कोहलबर्ग के तीनों स्तर और छह चरण क्रम से याद रखें।

उत्तर-पारंपरिक नैतिकता पर अभ्यास प्रश्न (MCQ)

कोहलबर्ग के सभी प्रश्न देखें →

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संदर्भ
  • लॉरेंस कोहलबर्ग, Essays on Moral Development, खंड 1 (1981)
  • NCERT, मनोविज्ञान की पाठ्यपुस्तकें