जीन पियाजे के अनुसार, बच्चे किस अवस्था में वस्तुओं को वर्गीकृत करने और उनके गुणों को समझने में सक्षम हो जाते हैं?
विस्तृत व्याख्या एवं समाधान
सही उत्तर: विकल्प C (मूर्त-संक्रियात्मक अवस्था - Concrete Operational Stage)
1. प्रस्तावना: जीन पियाजे का संज्ञानात्मक विकास और तार्किक संक्रियाएँ
स्विस मनोवैज्ञानिक जीन पियाजे (Jean Piaget) के संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत (Cognitive Development Theory) के अनुसार, बालकों में मानसिक संक्रियाओं (Mental Operations) का विकास एक व्यवस्थित और क्रमिक अनुक्रम में होता है। पियाजे ने स्पष्ट किया है कि बच्चे में वर्गीकरण (Classification) और श्रेणीबद्धता / क्रमबद्धता (Seriation) की वास्तविक तार्किक क्षमता 'मूर्त-संक्रियात्मक अवस्था' (Concrete Operational Stage) में विकसित होती है, जो लगभग 7 से 11 वर्ष की आयु (उत्तर बाल्यावस्था) तक चलती है। पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था (2-7 वर्ष) में बालक 'केंद्रीकरण' (Centration) और 'अपरिवर्तनीयता' (Irreversibility) के कारण वस्तुओं के केवल एक सतही पहलू पर ध्यान दे पाता है, किंतु 7 वर्ष की आयु के बाद वह वस्तुओं के बहु-आयामी गुणों को समझकर उन्हें श्रेणियों और तार्किक क्रम में व्यवस्थित करने में पूरी तरह समर्थ हो जाता है।
2. वर्गीकरण (Classification) और श्रेणीबद्धता (Seriation) का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण
मूर्त-संक्रियात्मक अवस्था में बालक के संज्ञानात्मक ढाँचे में दो प्रमुख तार्किक योग्यताओं का उदय होता है:
- श्रेणीबद्धता / क्रमबद्धता (Seriation):
- यह वस्तुओं को किसी निश्चित मात्रात्मक गुण—जैसे लंबाई, भार, ऊँचाई, आकार या संख्या के बढ़ते या घटते क्रम में तार्किक रूप से व्यवस्थित करने की क्षमता है।
- उदाहरण के लिए, यदि बालक को 8 विभिन्न लंबाइयों की छड़ियाँ दी जाएँ, तो 7 वर्ष से कम का बच्चा केवल दो-तीन छड़ियों की तुलना कर पाता है, जबकि मूर्त-संक्रियात्मक अवस्था का बालक सबसे छोटी से लेकर सबसे बड़ी छड़ी तक पूरी शृंखला को सटीक क्रम ($A < B < C < D$) में तुरंत लगा लेता है।
- यह क्षमता बालक में संक्रामकता (Transitivity) के विकास को दर्शाती है (यदि $A > B$ और $B > C$, तो $A > C$ होगा)।
- वर्गीकरण (Classification) एवं वर्ग-समावेशन (Class Inclusion):
- यह वस्तुओं को उनकी समानताओं, असमानताओं और साझा विशेषताओं के आधार पर विभिन्न समूहों और उप-समूहों में छाँटने की क्षमता है।
- पियाजे के प्रसिद्ध परीक्षण में जब बच्चों को 10 लकड़ी के मोती दिखाए गए (जिनमें 8 लाल और 2 सफेद थे) और पूछा गया—"क्या लाल मोती ज्यादा हैं या लकड़ी के मोती?", तो पूर्व-संक्रियात्मक बच्चा कहता है "लाल मोती ज्यादा हैं" (क्योंकि वह वर्ग और उप-वर्ग में भेद नहीं कर पाता)।
- इसके विपरीत, 7 से 11 वर्ष का मूर्त-संक्रियात्मक बालक तुरंत उत्तर देता है कि "लकड़ी के मोती ज्यादा हैं", क्योंकि वह समझ चुका होता है कि लाल मोती लकड़ी के मोतियों के ही वर्ग का एक उप-समूह (Sub-class) हैं। इसे वर्ग-समावेशन (Class Inclusion) कहा जाता है।
3. पियाजे की अवस्थाओं में वर्गीकरण और क्रमबद्धता का विकासात्मक तुलनात्मक चार्ट
| संज्ञानात्मक अवस्था | आयु वर्ग | वर्गीकरण (Classification) की स्थिति | क्रमबद्धता (Seriation) की स्थिति |
|---|---|---|---|
| 1. संवेदी-पेशीय (Sensorimotor) | जन्म से 2 वर्ष | अनुपस्थित; केवल संवेदी एवं गामक अन्वेषण। | अनुपस्थित; वस्तुओं के भौतिक गुणों की कोई समझ नहीं। |
| 2. पूर्व-संक्रियात्मक (Pre-operational) | 2 से 7 वर्ष | केंद्रीकरण के कारण केवल एक ही गुण (जैसे केवल रंग) के आधार पर सीमित वर्गीकरण। | अव्यवस्थित प्रयास; पूरी शृंखला को एक साथ क्रम में लगाने में असमर्थ। |
| 3. मूर्त-संक्रियात्मक (Concrete Operational) | 7 से 11 वर्ष | पूर्ण विकसित; बहु-स्तरीय वर्गीकरण और वर्ग-समावेशन की तार्किक समझ। | पूर्ण विकसित; लंबाई, आकार व भार के अनुसार सटीक क्रमबद्धता और संक्रामकता। |
| 4. औपचारिक संक्रियात्मक (Formal Operational) | 11 वर्ष से आगे | अमूर्त अवधारणाओं, विचारों और दार्शनिक सिद्धांतों का परिकल्पनात्मक वर्गीकरण। | अमूर्त प्रतीकों, बीजगणितीय चरों और संभावनाओं की क्रमबद्धता। |
4. अन्य विकल्पों का तार्किक खंडन
- विकल्प A (संवेदी-पेशीय अवस्था): इसमें शिशु का चिंतन केवल ज्ञानेंद्रियों और प्रतिवर्त क्रियाओं (Reflexes) तक सीमित रहता है। वस्तु स्थायित्व (Object Permanence) इस अवस्था की मुख्य उपलब्धि है, वर्गीकरण नहीं।
- विकल्प B (पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था): इस अवस्था में चिंतन आत्मकेंद्रित और अतार्किक होता है। बालक एक समय में वस्तु के केवल एक ही पहलू पर ध्यान केंद्रित कर पाता है (Centration), जिसके कारण वह जटिल वर्गीकरण या व्यवस्थित क्रमबद्धता नहीं कर पाता।
- विकल्प D (औपचारिक-संक्रियात्मक अवस्था): इस अवस्था में चिंतन अमूर्त, काल्पनिक और परिकल्पनात्मक-निगमनात्मक (Hypothetico-Deductive) हो जाता है। मूर्त वस्तुओं के वर्गीकरण और क्रमबद्धता की नींव इससे पिछली (मूर्त) अवस्था में ही पूरी तरह स्थापित हो चुकी होती है।
5. प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक स्तर पर शिक्षकों हेतु शैक्षणिक निहितार्थ
CTET, UPTET और शिक्षक भर्ती परीक्षाओं के दृष्टिकोण से शिक्षकों को यह समझना चाहिए कि कक्षा 1 से 5 (7-11 वर्ष) के बच्चों को गणित और पर्यावरण अध्ययन (EVS) सिखाते समय अमूर्त परिभाषाओं के बजाय ठोस वस्तुओं (Concrete Objects) का उपयोग करना चाहिए। कक्षा में पत्तियों, बीजों, आकृतियों, ब्लॉकों और मापन पट्टियों की सहायता से समूह बनाने और उन्हें छोटे से बड़े क्रम में सजाने की गतिविधियाँ करानी चाहिए। यह व्यावहारिक अनुभव बालक के मस्तिष्क में तार्किक संक्रियाओं को सुदृढ़ आधार प्रदान करता है।