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जीन पियाजे
Asked 4 महीने पहले · Viewed 1,623 times
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बच्चे के विकास के किस चरण में 'तर्कसंगत सोच' (Logical Thinking) का विकास प्रारंभ होता है?

विस्तृत व्याख्या एवं समाधान

सही उत्तर: विकल्प C (मूर्त-संक्रियात्मक अवस्था - Concrete Operational Stage)

1. प्रस्तावना: जीन पियाजे और तार्किक चिंतन (Logical Thinking) का उद्भव

स्विस मनोवैज्ञानिक जीन पियाजे (Jean Piaget) के संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत (Cognitive Development Theory) के अनुसार, बालकों में चिंतन का विकास क्रमिक और गुणात्मक अवस्थाओं से होकर गुजरता है। पियाजे ने स्पष्ट किया है कि बच्चे में वास्तविक 'तर्कसंगत सोच' (Logical Thinking) का प्रारंभ मूर्त-संक्रियात्मक अवस्था (Concrete Operational Stage) में होता है, जो सामान्यतः 7 से 11 वर्ष की आयु तक चलती है। इससे पूर्व की अवस्थाओं में बच्चे का चिंतन अंतःप्रज्ञात्मक (Intuitive), आत्मकेंद्रित (Egocentric) और प्रत्यक्ष अवलोकनों तक सीमित रहता है। 7 वर्ष की आयु में बालक पहली बार मानसिक संक्रियाओं (Mental Operations) को मूर्त यानी प्रत्यक्ष दिखाई देने वाली वस्तुओं और घटनाओं पर तार्किक रूप से लागू करने में सक्षम हो जाता है।

2. मूर्त-संक्रियात्मक अवस्था (7-11 वर्ष) की प्रमुख बौद्धिक उपलब्धियाँ

इस अवस्था में बालक के चिंतन में कई क्रांतिकारी संज्ञानात्मक क्षमताओं का उदय होता है, जो तर्कसंगत सोच की नींव रखती हैं:

  • संरक्षण की समझ (Conservation): बालक यह समझने लगता है कि किसी वस्तु की बाह्य आकृति, रूप या बर्तन बदलने से उसकी मात्रा, आयतन, भार या संख्या में कोई परिवर्तन नहीं होता (जैसे- चौड़े बर्तन से पतले लंबे गिलास में पानी डालने पर भी पानी की मात्रा समान रहती है)।
  • उत्क्रमणीयता / विलोमीयता (Reversibility): मानसिक रूप से प्रारंभिक बिंदु पर वापस लौटने की क्षमता। बालक समझ जाता है कि यदि पानी से बर्फ बनती है, तो बर्फ पिघलकर पुनः पानी बन सकती है, या $4 + 5 = 9$ है तो $9 - 5 = 4$ होगा।
  • विकेंद्रीकरण (Decentration): पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था के 'केंद्रीकरण' के विपरीत, अब बच्चा किसी समस्या या वस्तु के एक से अधिक पहलुओं पर एक साथ ध्यान केंद्रित कर सकता है।
  • वर्गीकरण (Classification): वस्तुओं को उनके विभिन्न गुणों (रंग, आकार, उपयोगिता) के आधार पर श्रेणियों और उप-श्रेणियों में व्यवस्थित करने की तार्किक योग्यता।
  • क्रमबद्धता (Seriation): वस्तुओं को किसी निश्चित माप (जैसे लंबाई, वजन, ऊँचाई) के बढ़ते या घटते क्रम में तार्किक रूप से सजाने की क्षमता।
  • मूर्त सीमा (Limitation of Concreteness): इस अवस्था का तर्क केवल मूर्त (प्रत्यक्ष उपस्थित) वस्तुओं तक ही सीमित रहता है; बालक अभी अमूर्त या काल्पनिक संभावनाओं पर परिकल्पनात्मक तर्क करने में सक्षम नहीं होता।

3. पियाजे की चारों संज्ञानात्मक अवस्थाओं में चिंतन का तुलनात्मक विकास

अवस्था का नाम आयु वर्ग चिंतन का स्वरूप एवं विशेषता तार्किकता का स्तर
1. संवेदी-पेशीय अवस्था (Sensorimotor) जन्म से 2 वर्ष ज्ञानेंद्रियों और गामक क्रियाओं द्वारा सीखना, वस्तु स्थायित्व (Object Permanence)। तर्क का पूर्ण अभाव (Pre-logical)।
2. पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था (Pre-operational) 2 से 7 वर्ष प्रतीकात्मक चिंतन, आत्मकेंद्रितता (Egocentrism), जीववाद (Animism), केंद्रीकरण। अतार्किक एवं अंतःप्रज्ञात्मक चिंतन (Intuitive, not logical)।
3. मूर्त-संक्रियात्मक अवस्था (Concrete Operational) 7 से 11 वर्ष मूर्त वस्तुओं पर तार्किक सोच, संरक्षण, विलोमीयता, वर्गीकरण व क्रमबद्धता। तर्कसंगत सोच का औपचारिक प्रारंभ (मूर्त संदर्भ में)।
4. औपचारिक/अमूर्त संक्रियात्मक (Formal Operational) 11 वर्ष से आगे परिकल्पनात्मक-निगमनात्मक तर्क (Hypothetico-deductive), अमूर्त और दार्शनिक सोच। पूर्ण विकसित अमूर्त वैज्ञानिक तर्क।

4. अन्य विकल्पों का तार्किक खंडन

  • विकल्प A (संवेदी-पेशीय अवस्था): इसमें शिशु केवल अपनी ज्ञानेंद्रियों और शारीरिक क्रियाओं से दुनिया को समझता है। यहाँ तार्किक चिंतन का कोई स्थान नहीं होता।
  • विकल्प B (पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था): इस अवस्था में चिंतन अतार्किक (Illogical) होता है। बच्चा केंद्रीकरण (Centration) और अपरिवर्तनीयता (Irreversibility) के कारण तार्किक निर्णय नहीं ले पाता।
  • विकल्प D (औपचारिक-संक्रियात्मक अवस्था): इसमें तर्कसंगत सोच का 'प्रारंभ' नहीं होता, बल्कि तार्किक चिंतन अपने सर्वोच्च एवं अमूर्त (Abstract) शिखर पर पहुँचता है। प्रश्न में 'विकास प्रारंभ होने' के बारे में पूछा गया है, जो मूर्त अवस्था में होता है।

5. प्राथमिक एवं उच्च-प्राथमिक कक्षा में शिक्षकों हेतु शैक्षणिक निहितार्थ

CTET और BPSC शिक्षक पात्रता परीक्षाओं के दृष्टिकोण से शिक्षकों को यह समझना चाहिए कि 7 से 11 वर्ष (कक्षा 1 से 5/6) के बच्चों को सिखाते समय ठोस शिक्षण अधिगम सामग्री (Concrete Manipulatives) जैसे गिनतारा (Abacus), लकड़ी के ब्लॉक, वास्तविक वस्तुएं और प्रत्यक्ष प्रयोगों का उपयोग अनिवार्य है। अमूर्त सूत्र सीधे रटाने के बजाय मूर्त अनुभवों के माध्यम से तार्किक संक्रियाओं को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।

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