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शिक्षा दर्शन एवं शिक्षा चिंतक
Asked एक महीने पहले · Viewed 3,865 times
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प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली और वैदिक काल के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. वैदिक काल में शिक्षा सत्र की शुरुआत 'उपनयन संस्कार' के साथ होती थी, जिसे 'दूसरा जन्म' (द्विज) कहा जाता था, और इस संस्कार के पश्चात छात्र को 'ब्रह्मचारी' की उपाधि मिलती थी।
  2. 2. 'समापवर्दन संस्कार' शिक्षा की समाप्ति या दीक्षांत समारोह के अवसर पर संपन्न होता था, जिसके बाद छात्र 'स्नातक' कहलाता था और वह अपने गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर सकता था।
  3. 3. वैदिक शिक्षा प्रणाली में छात्रों के लिए कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य था, और शिक्षा का मुख्य माध्यम संस्कृत भाषा थी, जिसमें वेदों, वेदांगों, दर्शन और आयुर्वेद की शिक्षा दी जाती थी।
  4. 4. वैदिक काल में महिलाओं को शिक्षा प्राप्त करने का पूर्ण अधिकार था और ऋग्वेद काल में गार्गी, मैत्रेयी, अपाला और घोषा जैसी विदुषी महिलाओं (ब्रह्मवादिनी) का उल्लेख मिलता है जिन्होंने वेदों के मंत्रों की रचना भी की थी।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

विस्तृत व्याख्या एवं समाधान

वैदिक कालीन शिक्षा प्रणाली के संदर्भ में दिए गए चारों कथन पूर्णतः सत्य हैं। 1. वेदों और प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, उपनयन संस्कार के माध्यम से बालक की औपचारिक शिक्षा का आरंभ होता था, जिसे उसका दूसरा जन्म (द्विज) माना जाता था और वह ब्रह्मचारी कहलाता था। 2. शिक्षा पूरी होने पर 'समापवर्दन संस्कार' होता था जिसके बाद छात्र 'स्नातक' बनकर गृहस्थ जीवन में प्रवेश करता था। 3. शिक्षा पूरी तरह से गुरु के आश्रम (गुरुकुल) में कठोर अनुशासन और ब्रह्मचर्य के पालन के साथ संस्कृत माध्यम से दी जाती थी। 4. ऋग्वेद काल में महिलाओं की स्थिति अत्यंत सम्मानित थी; उन्हें शिक्षा का अधिकार था और गार्गी, मैत्रेयी, अपाला, घोषा जैसी विदुषी महिलाओं ने उच्च कोटि के दार्शनिक ज्ञान तथा वैदिक ऋचाओं की रचना में योगदान दिया था।
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