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शिक्षा दर्शन एवं शिक्षा चिंतक
Asked एक महीने पहले · Viewed 4,099 times
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प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली और वैदिक काल के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. वैदिक काल में शिक्षा की शुरुआत 'उपनयन संस्कार' के साथ होती थी, जिसे 'बिना आँख वाला' या 'दूसरा जन्म' (द्विज) कहा जाता था, और इस संस्कार के पश्चात छात्र को 'ब्रह्मचारी' की उपाधि मिलती थी।
  2. 2. समापवर्दन संस्कार शिक्षा की समाप्ति या दीक्षांत समारोह के अवसर पर संपन्न होता था, जिसके बाद छात्र 'स्नातक' (गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करने वाला) कहलाता था।
  3. 3. वैदिक शिक्षा प्रणाली में छात्रों के लिए कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य था, और शिक्षा का मुख्य माध्यम संस्कृत भाषा थी, जिसमें वेदों, वेड़ाङ्गों, दर्शन और आयुर्वेद की शिक्षा दी जाती थी।
  4. 4. वैदिक काल में महिलाओं को शिक्षा प्राप्त करने का बिल्कुल भी अधिकार नहीं था और गार्गी, मैत्रेयी जैसी विदुषी महिलाओं का उल्लेख केवल पौराणिक कथाओं में मिलता है, जिनका वास्तविक शिक्षा से कोई संबंध नहीं था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

विस्तृत व्याख्या एवं समाधान

कथन 1, 2 और 3 सही हैं। वैदिक काल में शिक्षा का आरंभ 'उपनयन संस्कार' से होता था (आयु वर्ग वर्ण के अनुसार 8 से 12 वर्ष निर्धारित थी) और इस संस्कार के बाद बालक को 'द्विज' तथा 'ब्रह्मचारी' कहा जाता था। शिक्षा पूर्ण होने पर 'समापवर्दन संस्कार' होता था, जिसके बाद छात्र 'स्नातक' बनकर गृहस्थ जीवन में प्रवेश करता था। वैदिक शिक्षा संस्कृत भाषा में दी जाती थी और ब्रह्मचर्य का पालन अनिवार्य था। कथन 4 असत्य है क्योंकि वैदिक काल में महिलाओं की स्थिति अत्यंत उच्च थी; वे न केवल शिक्षा ग्रहण करती थीं बल्कि गार्गी, मैत्रेयी, अपाला और घोषा जैसी विदुषी महिलाओं ने उच्च कोटि के दार्शनिक वाद-विवादों में भाग लिया था और वैदिक मंत्रों की रचना भी की थी।
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