शिक्षा दर्शन एवं शिक्षा चिंतक
Asked 3 महीने पहले · Viewed 2,958 times
सामाजिक अध्ययन (Social Studies) शिक्षण के अंतर्गत भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के 'सविनय अवज्ञा आंदोलन' (Civil Disobedience Movement) और 'गांधी-इरविन समझौते' (Gandhi-Irwin Pact) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत महात्मा गांधी द्वारा 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से प्रसिद्ध 'दांडी मार्च' (Salt March) के साथ की गई थी, जिसके तहत 6 अप्रैल 1930 को दांडी में नमक कानून तोड़कर इस आंदोलन का देशव्यापी विस्तार किया गया था।
- 2. 5 मार्च 1931 को हस्ताक्षरित 'गांधी-इरविन समझौते' के तहत ब्रिटिश सरकार ने सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान गिरफ्तार किए गए सभी राजनीतिक बंदियों (हिंसक अपराधों में लिप्त व्यक्तियों को छोड़कर) को रिहा करने और समुद्र तट के किनारे बसे लोगों को बिना कर के अपने घरेलू उपयोग के लिए नमक बनाने की अनुमति देने पर सहमति व्यक्त की थी।
- 3. कांग्रेस की ओर से महात्मा गांधी ने इस समझौते के बाद कांग्रेस के कराची अधिवेशन (1931) की अध्यक्षता की थी और प्रथम गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए लंदन गए थे, जहाँ उन्होंने सांप्रदायिक पंचाट (Communal Award) के मुद्दे पर दलितों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की मांग का पूर्ण समर्थन किया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
विस्तृत व्याख्या एवं समाधान
कथन 1 सही है: महात्मा गांधी ने 12 मार्च 1930 को अपने 78 चुने हुए अनुयायियों के साथ साबरमती आश्रम से दांडी यात्रा शुरू की थी और 6 अप्रैल 1930 को दांडी पहुंचकर नमक कानून तोड़ा था, यहीं से सविनय अवज्ञा आंदोलन की औपचारिक शुरुआत हुई थी। कथन 2 सही है: 5 मार्च 1931 को वायसराय लॉर्ड इरविन और महात्मा गांधी के मध्य हुए 'गांधी-इरविन समझौते' (जिसे दिल्ली समझौता भी कहा जाता है) के अंतर्गत सरकार ने हिंसा के आरोपियों को छोड़कर सभी राजनीतिक बंदियों को रिहा करने तथा समुद्र तटीय क्षेत्रों में व्यक्तिगत एवं घरेलू उपयोग के लिए नमक बनाने की छूट देने की बात स्वीकार की थी। कथन 3 गलत है: गांधी-इरविन समझौते के बाद कांग्रेस का कराची अधिवेशन मार्च 1931 में हुआ था जिसकी अध्यक्षता वल्लभभाई पटेल ने की थी, न कि महात्मा गांधी ने। इसके अलावा, गांधीजी ने 'द्वितीय' गोलमेज सम्मेलन (1931) में भाग लिया था, न कि प्रथम गोलमेज सम्मेलन में (कांग्रेस ने प्रथम गोलमेज सम्मेलन का बहिष्कार किया था)। साथ ही, गांधीजी ने रेम्जे मैकडोनाल्ड के सांप्रदायिक पंचाट (Communal Award) में दलितों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की मांग का कड़ा विरोध किया था और इसके विरोध में येरवड़ा जेल में आमरण उपवास भी किया था।
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