एक बच्चा एक बिहारी परिवार में पले-बढ़े हैं, तो बच्चा स्वतः ही उसी भाषा को सीखते हुए बड़ा होगा। पहचानें कि बच्चे द्वारा अपने पारिवारिक वातावरण में सीखी जाने वाली भाषा उसकी होगी:
विस्तृत व्याख्या एवं समाधान
📌 मुख्य संकल्पना / सिद्धांत:
बच्चा जब किसी परिवार या सामाजिक परिवेश में जन्म लेता है, तो वह बिना किसी औपचारिक शिक्षण या व्याकरण के नियमों को रटे बिना स्वाभाविक रूप से अपने आस-पास बोली जाने वाली भाषा को ग्रहण करता है। इसे भाषा अर्जन (Language Acquisition) कहा जाता है। प्रश्न में दिए गए परिदृश्य के अनुसार, यदि एक बच्चा बिहारी परिवार में बड़ा होता है और स्वाभाविक रूप से उस परिवेश की भाषा सीखता है, तो वह भाषा उसकी 'प्रथम भाषा' (First Language) या मातृभाषा (Mother Tongue) कहलाती है। यह बच्चे के संज्ञानात्मक विकास और सामाजिक-सांस्कृतिक विकास की नींव रखती है।
📊 परीक्षा उपयोगी मुख्य बिंदु:
- प्रथम भाषा (First Language): यह वह भाषा है जिसे बच्चा अपने परिवार और परिवेश से सहज और स्वाभाविक रूप से सीखता है।
- भाषा अर्जन बनाम अधिगम: प्रथम भाषा का हमेशा 'अर्जन' (Acquisition) होता है, जबकि द्वितीय भाषा का औपचारिक 'अधिगम' (Learning) किया जाता है।
- विकल्प 'a' (क्षेत्रीय भाषा): यह भाषा किसी विशेष क्षेत्र से जुड़ी हो सकती है, लेकिन परिवार में सीखी जाने वाली अनिवार्य रूप से प्रथम भाषा होती है।
- विकल्प 'c' और 'd': विद्यालय की भाषा और द्वितीय भाषा औपचारिक संस्थानों यानी स्कूल के माध्यम से सीखी जाती हैं।
📖 सैद्धांतिक संदर्भ: नोम चॉमस्की के भाषा अर्जन उपकरण (LAD) सिद्धांत के अनुसार बच्चों में भाषा सीखने की जन्मजात क्षमता होती है। परिवार में सीखी जाने वाली भाषा इसी प्राकृतिक क्षमता का परिणाम है। अधिक जानने के लिए पढ़ें वाइगोत्स्की का सामाजिक-सांस्कृतिक सिद्धांत।
🎯 परीक्षा दृष्टिकोण: CTET / UPTET / BPSC TRE हेतु महत्वपूर्ण विस्तृत हल ➔
गहन विश्लेषण एवं परीक्षा उपयोगी रणनीतियाँ:
बाल विकास और शिक्षाशास्त्र (CDP) में भाषा विकास एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। CTET और अन्य शिक्षक पात्रता परीक्षाओं में भाषा से जुड़े प्रश्न अक्सर अर्जन (Acquisition) और अधिगम (Learning) के अंतर पर आधारित होते हैं। जब कोई बच्चा अपने घर, परिवार या पास-पड़ोस के वातावरण से अनौपचारिक रूप से कोई भाषा सीखता है, तो वह हमेशा उसकी मातृभाषा या प्रथम भाषा होती है। इसके विपरीत, द्वितीय भाषा वह होती है जो स्कूल या औपचारिक माध्यम से सीखी जाती है। शिक्षकों को कक्षा में हमेशा बच्चे की प्रथम भाषा का सम्मान करना चाहिए क्योंकि यह समावेशी शिक्षा का एक मुख्य आधार है।