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लेव वाइगोत्स्की
Asked 3 महीने पहले · Viewed 1,612 times
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किस मनोवैज्ञानिक ने स्व-नियमन के लिए निजी भाषण (private speech) की बात की?

विस्तृत व्याख्या एवं समाधान

📌 मुख्य संकल्पना / सिद्धांत:

लेव वाइगोत्स्की (Lev Vygotsky) के सामाजिक-सांस्कृतिक विकास के सिद्धांत में 'निजी भाषण' (Private Speech) की अवधारणा को बेहद महत्वपूर्ण माना गया है। वाइगोत्स्की के अनुसार, जब बच्चे अपने व्यवहार और विचारों को निर्देशित करने, नियंत्रित करने या स्व-नियमन (Self-regulation) करने के लिए तेज आवाज में खुद से बातें करते हैं, तो उसे निजी भाषण कहा जाता है। बाल्यावस्था में बच्चे अपनी समस्याओं को हल करने और कार्य योजना बनाने के लिए इसका उपयोग करते हैं। यह बाद में आंतरिक वाक् (Inner Speech) में बदल जाता है जो मानसिक चिंतन का आधार बनता है। अतः विकल्प 'a' सही उत्तर है।

📊 परीक्षा उपयोगी मुख्य बिंदु:

  • जीन पियाजे ने इस प्रकार की वाणी को 'अहंकेन्द्रित भाषण' (Egocentric Speech) कहा था और इसे बच्चों की अपरिपक्वता का प्रतीक माना था।
  • वाइगोत्स्की ने इसे संज्ञानात्मक विकास का एक अत्यंत आवश्यक और सकारात्मक उपकरण माना, जो बच्चे को संज्ञानात्मक स्वायत्तता प्रदान करता है।
  • अन्य विकल्प: जीन पियाजे संज्ञानात्मक विकास, लॉरेंस कोहलबर्ग नैतिक विकास और रूसो प्रकृतिवादी शिक्षा से संबंधित हैं।
  • निजी भाषण बच्चे के बाह्य सामाजिक संवाद से आंतरिक मानसिक प्रक्रिया में संक्रमण की महत्वपूर्ण कड़ी है।

📖 सैद्धांतिक संदर्भ: लेव वाइगोत्स्की का सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य भाषा और चिंतन के अंतर्संबंधों को गहराई से स्पष्ट करता है। विस्तृत अध्ययन के लिए वाइगोत्स्की का सिद्धांत देखें।

🎯 परीक्षा दृष्टिकोण: CTET / UPTET / BPSC TRE हेतु महत्वपूर्ण विस्तृत हल ➔

गहन विश्लेषण एवं परीक्षा उपयोगी रणनीतियाँ:

शिक्षक पात्रता परीक्षाओं (जैसे CTET, UPTET, DSSSB और KVS) में वाइगोत्स्की और पियाजे के बीच के वैचारिक मतभेद पर बार-बार प्रश्न पूछे जाते हैं। जहाँ पियाजे का मानना था कि बच्चे अहंकेन्द्रित होने के कारण खुद से बातें करते हैं और उम्र बढ़ने के साथ यह समाप्त हो जाती है, वहीं वाइगोत्स्की का मानना था कि निजी भाषण समय के साथ 'आंतरिक वाक्' (Inner Speech) में परिवर्तित हो जाता है और वयस्क भी जटिल समस्याओं को हल करते समय मन ही मन इसका प्रयोग करते हैं। अध्यापन के दौरान शिक्षकों को बच्चों को अपनी समस्याओं को बोल-बोलकर हल करने से रोकना नहीं चाहिए, क्योंकि यह उनके स्व-नियमन और संज्ञानात्मक विकास का एक स्वाभाविक और सशक्त माध्यम है।

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