बालक के विकास में 'वातावरण' (Environment) की भूमिका का मुख्य अर्थ क्या है?
विस्तृत व्याख्या एवं समाधान
सही उत्तर: विकल्प B (अपसारी चिंतन - Divergent Thinking)
1. प्रस्तावना: मनोविज्ञान में सृजनात्मकता (Creativity) की अवधारणा
शिक्षा मनोविज्ञान और संज्ञानात्मक विज्ञान में सृजनात्मकता (Creativity) से तात्पर्य किसी नई, अनूठी, मौलिक और उपयोगी वस्तु, विचार या समाधान को उत्पन्न करने की मानसिक योग्यता से है। मनोवैज्ञानिक क्रो एवं क्रो (Crow & Crow) के शब्दों में: "सृजनात्मकता मौलिक परिणामों को अभिव्यक्त करने की एक मानसिक प्रक्रिया है।" इसी प्रकार ड्रेवहल (Drevdahl) के अनुसार, सृजनात्मकता वह मानवीय योग्यता है जिसके द्वारा व्यक्ति किसी नए विचार या रचना को अस्तित्व में लाता है। 1950 के दशक में प्रसिद्ध अमेरिकी मनोवैज्ञानिक जे.पी. गिलफोर्ड (J.P. Guilford) ने यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध किया कि सृजनात्मकता का सबसे अनिवार्य और प्राथमिक संज्ञानात्मक आधार 'अपसारी चिंतन' (Divergent Thinking / Out-of-the-Box Thinking) होता है।
2. अपसारी चिंतन (Divergent Thinking): सृजनात्मकता की प्राणवायु
गिलफोर्ड और ई. पॉल टॉरेंस (E. Paul Torrance - जिन्हें 'सृजनात्मकता परीक्षण का पिता' कहा जाता है) के अनुसार अपसारी चिंतन वह प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति किसी समस्या के समाधान के लिए एक ही लकीर पर चलने के बजाय विभिन्न दिशाओं में सोचता है। इसके प्रमुख चार लक्षण निम्नलिखित हैं:
- 1. प्रवाह / धाराप्रवाहिता (Fluency): किसी दिए गए विषय या समस्या पर अत्यधिक संख्या में नए-नए विचारों को तीव्र गति से उत्पन्न करने की क्षमता।
- 2. लचीलापन / विविधता (Flexibility): विचारों में विविधता होना; एक ही दृष्टिकोण पर न अटककर विभिन्न श्रेणियों, कोणों और संदर्भों से सोचना।
- 3. मौलिकता (Originality): विचारों में नवीनता और अद्वितीयता होना। ऐसे समाधान खोजना जो समाज में पहले से प्रचलित या पारंपरिक न हों (Statistical infrequency)।
- 4. विस्तारण (Elaboration): किसी मूल विचार में विस्तार से नए विवरण जोड़कर उसे और अधिक परिष्कृत, स्पष्ट तथा सुरुचिपूर्ण बनाना।
3. अपसारी चिंतन बनाम अभिसारी चिंतन: सबसे महत्वपूर्ण अंतर
CTET और BPSC शिक्षक भर्ती परीक्षाओं में गिलफोर्ड द्वारा दिए गए चिंतन के इन दो प्रकारों पर बार-बार प्रश्न पूछे जाते हैं:
| तुलना का आधार | अपसारी चिंतन (Divergent Thinking) | अभिसारी चिंतन (Convergent Thinking) |
|---|---|---|
| मानसिक संबंध | सृजनात्मकता (Creativity) से सीधे संबंधित। | पारंपरिक बुद्धि (Intelligence / IQ) से संबंधित। |
| चिंतन की दिशा | एक बिंदु से कई दिशाओं में फैलना (बहु-दिशात्मक / Out of the Box)। | कई दिशाओं से आकर एक ही सही उत्तर पर सिमट जाना (एक-दिशात्मक)। |
| प्रश्नों का स्वरूप | मुक्त अंत वाले प्रश्न (Open-Ended Questions)। | बंद अंत वाले प्रश्न (Closed-Ended / Multiple Choice)। |
| समाधान की प्रकृति | समस्या के अनेक संभावित एवं अनूठे समाधान। | समस्या का केवल एक निश्चित और सही समाधान। |
| कक्षा का उदाहरण | "यदि पेड़ चलने लगें तो क्या होगा?" (काल्पनिक और स्वतंत्र सोच)। | "भारत की राजधानी कहाँ है?" (केवल एक निश्चित तथ्य आधारित उत्तर)। |
4. अन्य विकल्पों का तार्किक खंडन
- विकल्प A (अभिसारी चिंतन - Convergent Thinking): यह पारंपरिक बुद्धि परीक्षणों, स्मरण शक्ति और गणितीय सूत्रों के सही उत्तर खोजने से जुड़ा है। इसमें लीक से हटकर नए विचार पैदा नहीं होते; अतः यह सृजनात्मकता का मुख्य लक्षण नहीं है।
- विकल्प C (संवेगात्मक अस्थिरता - Emotional Instability): सृजनात्मक व्यक्ति संवेगात्मक रूप से संवेदनशील हो सकते हैं, परंतु 'अस्थिरता' सृजनात्मकता की कोई अनिवार्य विशेषता या पूर्व-शर्त नहीं है। संवेगात्मक संतुलन सृजन प्रक्रिया को सुगम बनाता है।
- विकल्प D (रूढ़िवादिता - Stereotyping): रूढ़िवादिता और अंधानुकरण सृजनात्मकता के कट्टर विरोधी हैं। सृजनात्मकता स्थापित परंपराओं और जड़ताओं को तोड़कर नए दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है।
5. कक्षा में सृजनात्मकता को पोषित करने हेतु शिक्षकों के लिए रणनीतियाँ
शिक्षकों को यह समझना चाहिए कि कक्षा में प्रत्येक बालक में सृजनात्मकता के बीज होते हैं। बालकों में अपसारी चिंतन को बढ़ावा देने के लिए शिक्षक को निम्नलिखित उपाय करने चाहिए:
- विचार-मंथन सत्र (Brainstorming Sessions): कक्षा में बच्चों को बिना किसी आलोचना के डर के स्वतंत्र रूप से अपने विचार प्रकट करने की छूट देना।
- मुक्त अंत वाले प्रश्नों (Open-Ended Tasks) का उपयोग: बच्चों से ऐसे प्रश्न पूछना जिनके कई उत्तर हो सकते हैं, जैसे—"पानी बचाने के पाँच अनोखे तरीके बताइए।"
- त्रुटियों को स्वीकारना (Tolerance of Ambiguity): बच्चों की मौलिक भूलों और अनोखे विचारों का उपहास उड़ाने के बजाय उनकी नवीन सोच की सराहना करना और जिज्ञासा को प्रोत्साहित करना।