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सर्पिल पाठ्यक्रम (Spiral Curriculum) क्या है?

सर्पिल पाठ्यक्रम में किसी विषय के मूल विचार कक्षा दर कक्षा बार-बार लौटते हैं, हर बार थोड़ी ज़्यादा गहराई और जटिलता के साथ। यह अवधारणा जेरोम ब्रूनर की है।

सर्पिल पाठ्यक्रम: विस्तृत व्याख्या

सर्पिल पाठ्यक्रम को समझें

ब्रूनर ने द प्रोसेस ऑफ एजुकेशन (1960) में कहा कि किसी भी विषय का मूल ढाँचा किसी भी उम्र के बच्चे को उसकी समझ के अनुरूप रूप में पढ़ाया जा सकता है। इसलिए विषय एक बार पढ़ाकर छोड़ा नहीं जाता, कुछ अंतराल पर लौटाया जाता है। इसे सीढ़ी नहीं, कुंडली की तरह समझें।

याद रखने योग्य बिंदु

  • वही विषय, हर बार ऊँचे स्तर पर
  • पहले की समझ पर नई समझ जुड़ती है
  • पुस्तक: The Process of Education (1960)

उदाहरण

छोटी कक्षा में भिन्न आधा-चौथाई जैसी आकृतियों से शुरू होती है, मध्य कक्षाओं में जोड़-घटाव और तुल्य भिन्न आती हैं, और ऊपर की कक्षाओं में वही भिन्न बीजगणित में काम आती है।

परीक्षा में कैसे पूछा जाता है

विषय को बढ़ती कठिनाई के साथ दोहराना यानी सर्पिल पाठ्यक्रम, ब्रूनर। पियाजे की अवस्थाओं से न मिलाएँ, वे यह बताती हैं कि बच्चा क्या समझ सकता है, पाठ्यक्रम कैसे सजे यह नहीं।

सर्पिल पाठ्यक्रम पर अभ्यास प्रश्न (MCQ)

ब्रूनर के सभी प्रश्न देखें →

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संबंधित अवधारणाएँ

संदर्भ
  • जेरोम ब्रूनर, The Process of Education (1960)
  • NCERT, राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005